[Ashok Kumar Pandey] What Did Soni Sori Do Wrong? (in Hindi)

सोनी सोरी की कहानी अब कोई नई कहानी नहीं रही. न यह उस दिन शुरू हुई थी जब उन्हें पुलिस के दबाव में दंतेवाड़ा छोड़कर भागना पड़ा था, न उनके किसी अंजाम पर खत्म हो जायेगी. लोकतंत्र के आवरण तले चलने वाली दमन और उत्पीडन की यह कहानी अलग-अलग रूप में लगातार दुहराई गयी है और आज भी यह बदस्तूर जारी है. महानगरों के आरामदेह कमरों में बैठकर हम विकास को आंकड़ो की भाषा से पकडने की कोशिशें करते हुए नए-नए माल्स और उपभोक्ता वस्तुओं की चमक से चुंधियाई आँखों से सत्ताओं के बदलने और आभासी आन्दोलनों के घटाटोप के इतने आदी होते जा रहे हैं कि देश के एक बड़े हिस्से के लगातार यातना-गृह में तबदील होते जाने को देख ही नहीं पाते. विदर्भ और बुंदेलखंड सहित देश के तमाम हिस्सों में लगातार खुदकुशी करते किसान, फैक्ट्रियों में बिना किसी सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा के सोलह-सोलह घंटे खटते मजदूर, निजी कंपनियों के जुए तले पिसते तथाकथित प्रोफेशनल्स, उत्तर-पूर्व में अमानवीय कानूनों का बोझ ढोते लोग और छत्तीसगढ़ के नक्सल-प्रभावित इलाकों में दोहरी-तिहरी मार झेलते आदिवासी हमारी इस समकालीन विकास की बहस से बाहर की चीज़ बनते चले जा रहे हैं. न टीवी चैनल्स के लिए इनके पास कोई ‘एक्सक्लूसिव बाईट’ है न ही अखबारों के तीसरे पेज़ के लिए खबरें या पहले पेज़ के लिए विज्ञापन. वरना यूँ न होता कि इस देश में किसी जगह एक महिला के साथ कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद वह अमानवीय उत्पीडन होता जो सोनी सोरी के साथ हुआ और इसके ज़िम्मेदार पुलिस वाले को सज़ा की जगह महामहिम पुरस्कार न देतीं, वरना कोई चुनी हुई सरकार किसी गाँधीवादी के आश्रम को यूँ ज़मीदोज न कर देती, वरना इतना सब हो जाने के बाद भी इस देश में इतनी चुप्पी न होती.

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